पञ्चमहायज्ञ और श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित यज्ञ-स्वरूप
पंच महायज्ञ का महत्व:- सनातन धर्म में वैदिक काल से ही पञ्चमहायज्ञों के सम्पादक की व्यवस्था है। पञ्चमहायज्ञों के विषय में पहले तो यह जानना महत्वपूर्ण है कि ये केवल गृहस्थियों के लिए कहे गए हैं। इनमें से एक-दो दूसरे आश्रमों के लिये कहे गये है। पंच महायज्ञ हिन्दू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण बताये गए है। धर्म शास्त्रों ने भी हर गृहस्थ को प्रतिदिन पंच महायज्ञ करने के लिए कहा है। नियमित रूप से इन पंच यज्ञों को करने से सुख समृद्धि व जीवन में प्रसन्नता बनी रहती है। इन महायज्ञों के करने से ही मनुष्य का जीवन,परिवार, समाज, शुद्ध,सदाचारी और सुखी रहता है। शास्त्र विधि के अनुसार तीनों ऋणों से अनृण होने के लिए शास्त्रों के नित्य कर्म का विधान किया है। जिसे करके मनुष्य देव,ॠषि और पितृ-सम्बंधी तीनो ॠणो से मुक्त हो सकता है। नित्यकर्म में शारीरिक शुद्धि,संध्या बन्धन, तर्पण और देव-पूजन प्रकृति शास्त्र निर्दिष्ट कर्म आते हैं। इनमें से ६ कर्म कुछ इस प्रकार है- सन्ध्या स्नानं जपश्चैव देवतानां च पूजनम् । वैश्वदेवं तथाऽऽतिथ्यं षट् कर्माणि दिने दिने ।(परा० स्मृ० १-३९) मनुष्यको स्नान,...