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तर्पण-प्रयोग-विधि

गायत्रीमन्त्रसे शिखा बाँधकर तिलक लगाकर प्रथम दाहिनी अनामिकाके मध्य पोरमें दो कुशों और बायीं अनामिकामें तीन कुशोंकी पवित्री धारण कर ले। फिर हाथमें त्रिकुश, यव, अक्षत और जल लेकर निम्नलिखित संकल्प पढ़े- अद्य... श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थं देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणं करिष्ये। आवाहन - इसके बाद ताँबेके पात्रमें जल और चावल डालकर त्रिकुशको पूर्वाग्र रखकर उस पात्रको दायें हाथमें लेकर बायें हाथसे ढककर नीचे लिखा मन्त्र पढ़कर देव ऋषियोंका आवाहन करे। आवाहन-मन्त्र- ब्रह्मादयः सुराः सर्वे, ऋषयः सनकादयः । आगच्छन्तु महाभागा, ब्रह्माण्डोदरवर्तिनः ।। (१). देव-तर्पण-विधि- देव तथा ऋषि-तर्पण में - १-पूरब दिशाकी ओर मुँह करे। २-जनेऊको सव्य रखे। ३-दाहिना घुटना जमीनपर लगाकर बैठे। ४-अर्घ्यपात्रमें चावल छोड़े । ५-तीनों कुशोंको पूर्वकी ओर अग्रभाग' कर रखे। ६-जलकी अञ्जलि एक-एक हो। ७-देवतीर्थसे अर्थात् दायें हाथकी अँगुलियोंके अग्रभागसे दे। (देवतीर्थका चित्र पृ० सं० ६० में देखें) ८-जलाञ्जलिको सोना, चाँदी, ताँबा अथवा काँसेके बर्तनमें डाले। यदि नदीमें तर्पण किया जाय तो दोनों हाथोंको मिलाकर जलसे भरकर गौकी सींग ज...

वेदों में सौंदर्यवर्धक औषधियां

         वेद भारतीय संस्कृति के मूल स्रोत हैं भारतीय संस्कृति का यथार्थ ज्ञान वेदों में और वैदिक वाङ्मय से ही प्राप्त होता है प्राचीन समय में वस्तुओं के नाम आदि तथा मानव के कर्तव्यों का निर्धारण वेदों में ही किया गया हैं । सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् । वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे ॥          वेदों में सभी प्रकार का ज्ञान है वेद चार – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद इन में से अथर्ववेद में सभी प्रकार का व्यावहारिक उपयोगिता में आने वाले औषधीयों का ज्ञान है ।          पेड़ पौधे और जड़ी बूटी का ज्ञान भी है यहां पर हम कुछ वेदों की जड़ी बूटी का अपने सौंदर्य पर असर होता है ।          क्योंकि आजकल बाजार में अनेक औषधि प्राप्त होती है परंतु यह तो शरीर को नुकसान देने वाली होती है आयुर्वेद और वेदों में बताया हुआ औषधि का मनुष्य को फायदा ही होगा यह तो मालूम होगा कि आयुर्वेद और वेद में बताए मार्ग से फायदा धीरे-धीरे होगा परंतु नुकसान नहीं होगा ।       ...

पञ्चमहायज्ञ और श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित यज्ञ-स्वरूप

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पंच महायज्ञ का महत्व:-     सनातन धर्म में वैदिक काल से ही पञ्चमहायज्ञों के सम्पादक की व्यवस्था है। पञ्चमहायज्ञों के विषय में पहले तो यह जानना महत्वपूर्ण है कि ये केवल गृहस्थियों के लिए कहे गए हैं। इनमें से एक-दो दूसरे आश्रमों के लिये कहे गये है। पंच महायज्ञ हिन्दू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण बताये गए है। धर्म शास्त्रों ने भी हर गृहस्थ को प्रतिदिन पंच महायज्ञ करने के लिए कहा है। नियमित रूप से इन पंच यज्ञों को करने से सुख समृद्धि व जीवन में प्रसन्नता बनी रहती है। इन महायज्ञों के करने से ही मनुष्य का जीवन,परिवार, समाज, शुद्ध,सदाचारी और सुखी रहता है। शास्त्र विधि के अनुसार तीनों ऋणों से अनृण होने के लिए शास्त्रों के नित्य कर्म का विधान किया है। जिसे करके मनुष्य देव,ॠषि और पितृ-सम्बंधी तीनो ॠणो से मुक्त हो सकता है। नित्यकर्म में शारीरिक शुद्धि,संध्या बन्धन, तर्पण और देव-पूजन प्रकृति शास्त्र निर्दिष्ट कर्म आते हैं। इनमें से ६ कर्म कुछ इस प्रकार है- सन्ध्या स्नानं जपश्चैव देवतानां च पूजनम् ।  वैश्वदेवं तथाऽऽतिथ्यं षट् कर्माणि दिने दिने ।(परा० स्मृ० १-३९) मनुष्यको स्नान,...

RT-JCO धर्म शिक्षक Previous Year Question Paper

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धर्म शिक्षक भर्ती 2024  |  धर्म शिक्षक प्रश्न पत्र pdf  |  धर्म शिक्षक प्रश्न पत्र *भारतीय सेना में एक धार्मिक शिक्षक की भूमिका तबादला और नैतिक मार्गदर्शन प्रदान करना है, और सेना के भीतर धार्मिक अभ्यास और अनुष्ठानों को सुविधाजनक बनाने में मदद करना है। भारतीय सेना धार्मिक विश्वास की महत्वपूर्णता को मानती है और उसके सैनिकों के भलाइ और मनोबल पर प्रभाव को समझती है, और इसलिए अपने कर्मचारियों की विविध धर्मिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए धार्मिक शिक्षकों को नियोक्ति देती है।* भारतीय सेना में धार्मिक शिक्षकों की आमतौर पर भारत में प्रमुख धर्म मतों से चयनित किए जाते हैं, जैसे कि हिन्दू धर्म, इस्लाम, सिख धर्म, ईसाई धर्म, और बौद्ध धर्म। उन्हें भारतीय सेना में जूनियर कमीशन्ड ऑफिसर्स (JCOs) के रूप में नियुक्त किया जाता है, जो भारतीय सेना में नॉन-कमीशन्ड ऑफिसर्स (NCOs) और कमीशन्ड ऑफिसर्स के बीच की एक रैंक है। *भारतीय सेना में एक धार्मिक शिक्षक की प्रमुख जिम्मेदारियां शामिल हैं:* 1: - धार्मिक आयोजन और प्रार्थनाएँ का आयोजन: धार्मिक शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि...

गोत्र कितने होते हैं: जानिए कितने प्रकार के गोत्र होते हैं और उनके नाम

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गोत्र कितने होते हैं: पूरी जानकारी गोत्र का अर्थ और महत्व गोत्र एक ऐसी परंपरा है जो हिंदू धर्म में प्रचलित है। गोत्र एक परिवार को और उसके सदस्यों को भी एक जीवंत संबंध देता है। गोत्र का अर्थ होता है 'गौतम ऋषि की संतान' या 'गौतम ऋषि के वंशज'। गोत्र के माध्यम से, एक परिवार अपने वंशजों के साथ एकता का आभास करता है और उनके बीच सम्बंध को बनाए रखता है। गोत्र कितने प्रकार के होते हैं हिंदू धर्म में कई प्रकार के गोत्र होते हैं। यहां हम आपको कुछ प्रमुख गोत्रों के नाम बता रहे हैं: भारद्वाज वशिष्ठ कश्यप अग्निवंशी गौतम भृगु कौशिक पुलस्त्य आत्रेय अंगिरस जमदग्नि विश्वामित्र गोत्रों के महत्वपूर्ण नाम यहां हम आपको कुछ महत्वपूर्ण गोत्रों के नाम बता रहे हैं: भारद्वाज गोत्र वशिष्ठ गोत्र कश्यप गोत्र अग्निवंशी गोत्र गौतम गोत्र भृगु गोत्र कौशिक गोत्र पुलस्त्य गोत्र आत्रेय गोत्र अंगिरस गोत्र जमदग्नि गोत्र विश्वामित्र गोत्र ब्राह्मण गोत्र लिस्ट यहां हम आपको कुछ ब्राह्मण गोत्रों के नाम बता रहे हैं: भारद्वाज गोत्र वशिष्ठ गोत्र कश्यप गोत्र भृगु गोत्र आत्रेय गोत्र अंगिरस गोत्र कश्यप गोत्र की कुलदे...